1.
जन्म के भी साथ है जो ,
मृत्यु के भी बाद है जो ।।
अंत का भी अंत है जो ,
साधु सीधा सन्त है जो ।।
जो देखने मे दीन है ,
समाधि में जो लीन है ।।
वो जीत है वो हार है ,
पुराणों का भी सार है ।।
बैकुंठ है पाताल है ,
वो मेरा महाँकाल है , वो मेरा महाँकाल है ।।
2,
पर्वत की ऊंचाई है जो ,
गहरी खोदी खाई है जो ।।
सूर्य का प्रकाश है जो ,
चन्द्र का उजास है जो ।।
विभत्स है विभोर है ,
ब्रह्मांड का जो छोर है ।।
है जिसमे कोई छल नही ,
जिसका कोई कल नही ।।
जो खुद अनन्तकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।। 3.
श्मशान में जो नाचता है ,
जिससे भय भी भागता है ।।
जो अंधेरा ओढ़ लेता ,
तूफानों को मोड़ देता ।।
जलती हुई आग है जो ,
निज चिता की राख है जो ।।
हर ह्रदय की श्वाश है जो ,
कण कणों में वास है जो ।।
सूक्ष्म है विकराल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।।
4,
शोर भी है शांत है जो ,
बैठा भी एकांत है जो ।।
हाथ मे त्रिशूल है ,
भूमध्य का भी मूल है ।।
त्रिनेत्र जिसके आग है ,
गले संभाले नाग है ।।
चेहरा जिसका लाल है ,
बिखरे बिखरे बाल है ।।
लपटे भी सिंह की खाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।
जन्म के भी साथ है जो ,
मृत्यु के भी बाद है जो ।।
अंत का भी अंत है जो ,
साधु सीधा सन्त है जो ।।
जो देखने मे दीन है ,
समाधि में जो लीन है ।।
वो जीत है वो हार है ,
पुराणों का भी सार है ।।
बैकुंठ है पाताल है ,
वो मेरा महाँकाल है , वो मेरा महाँकाल है ।।

2,
पर्वत की ऊंचाई है जो ,
गहरी खोदी खाई है जो ।।
सूर्य का प्रकाश है जो ,
चन्द्र का उजास है जो ।।
विभत्स है विभोर है ,
ब्रह्मांड का जो छोर है ।।
है जिसमे कोई छल नही ,
जिसका कोई कल नही ।।
जो खुद अनन्तकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।। 3.

श्मशान में जो नाचता है ,
जिससे भय भी भागता है ।।
जो अंधेरा ओढ़ लेता ,
तूफानों को मोड़ देता ।।
जलती हुई आग है जो ,
निज चिता की राख है जो ।।
हर ह्रदय की श्वाश है जो ,
कण कणों में वास है जो ।।
सूक्ष्म है विकराल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।।

4,
शोर भी है शांत है जो ,
बैठा भी एकांत है जो ।।
हाथ मे त्रिशूल है ,
भूमध्य का भी मूल है ।।
त्रिनेत्र जिसके आग है ,
गले संभाले नाग है ।।
चेहरा जिसका लाल है ,
बिखरे बिखरे बाल है ।।
लपटे भी सिंह की खाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।

