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April 1, 2019

2019 वो मेरा महाँकाल की नगरी

1.                           
जन्म के भी साथ है जो ,
मृत्यु के भी बाद है जो ।।

अंत का भी अंत है जो ,
साधु सीधा सन्त है जो ।।

जो देखने मे दीन है ,
समाधि में जो लीन है ।।

वो जीत है वो हार है ,
पुराणों का भी सार है ।।

बैकुंठ है पाताल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,                                          वो मेरा महाँकाल है ।।                                  

2,
पर्वत की ऊंचाई है जो ,
गहरी खोदी खाई है जो ।।

सूर्य का प्रकाश है जो ,
चन्द्र का उजास है जो ।।

विभत्स है विभोर है ,
ब्रह्मांड का जो छोर है ।।

है जिसमे कोई छल नही ,
जिसका कोई कल नही ।।

जो खुद अनन्तकाल है ,  
वो मेरा महाँकाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ।।                                          3.
श्मशान में जो नाचता है ,
जिससे भय भी भागता है ।।

जो अंधेरा ओढ़ लेता ,
तूफानों को मोड़ देता ।।

जलती हुई आग है जो ,
निज चिता की राख है जो ।।

हर ह्रदय की श्वाश है जो ,
कण कणों में वास है जो ।।

सूक्ष्म है विकराल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,
     वो मेरा महाँकाल है ।।      

4,
शोर भी है शांत है जो ,
बैठा भी एकांत है जो ।।

हाथ मे त्रिशूल है ,
भूमध्य का भी मूल है ।।

त्रिनेत्र जिसके आग है ,
गले संभाले नाग है ।।

चेहरा जिसका लाल है ,
बिखरे बिखरे बाल है ।।

लपटे भी सिंह की खाल है ,
वो मेरा महाँकाल है ,            
वो  मेरा महाँकाल है ।     

   

Mera bharat